बीन्स और लोबिया उत्पादन की समग्र सिफारिशें

बीन्स और लोबिया की खेती किसानों और बागवानों के लिए कम देखरेख में अधिक पैदावार और बढ़िया मुनाफा कमाने का एक तेज़ और आसान तरीका है। ये फसलें गर्मी और मानसून दोनों मौसमों में गर्म जलवायु और अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में खूब फलती-फूलती हैं। बीमारियों से बचाव के लिए उपचारित उत्तम बीजों का उपयोग करने, जैविक खाद से उपजाऊ मिट्टी तैयार करने और पंक्तियों को खरपतवार मुक्त रखने से पौधों की बढ़वार तेजी से होती है और भरपूर फूल आते हैं। झाड़ीदार किस्में बिना किसी सहारे के खुद बढ़ती हैं, जबकि लतर (बेल) वाली किस्मों को बांस या जाल का हल्का सहारा देकर और भी अधिक पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

बीन्स और लोबिया उत्पादन की समग्र सिफारिशें

जलवायु: हल्की, पाला-रहित जलवायु; अत्यधिक गर्मी फूलों को प्रभावित करती है

मिट्टी: उपजाऊ, अच्छी जल निकासी वाली बलुई दोमट से दोमट मिट्टी

पीएच (pH): 5.5–7.0

खेत की तैयारी: मिट्टी को भुरभुरा बनाने के लिए 2–3 गहरी जुताई

बीज दर: लगभग 20–25 किलोग्राम प्रति एकड़

बुवाई का समय: फरवरी–मार्च (वसंत ऋतु) और सितंबर–अक्टूबर (शरद ऋतु)

दूरी (स्पेसिंग): पंक्ति से पंक्ति – 30–45 सेमी और पौधे से पौधे – 10–15 सेमी

उर्वरक एवं खाद: सड़ी गोबर की खाद (FYM) – 8–10 टन प्रति एकड़; 20–25 किलोग्राम नाइट्रोजन + 20–25 किलोग्राम फास्फोरस + 20 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़

सिंचाई: बुवाई के तुरंत बाद और आवश्यकतानुसार समय-समय पर सिंचाई करें; खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखें लेकिन जलभराव न होने दें

खरपतवार नियंत्रण: शुरुआती बढ़वार के दौरान हाथ से निराई-गुड़ाई करें

प्रमुख कीट एवं रोकथाम:

  • माहू (एफिड): थायमेथोक्सम, इमिडाक्लोप्रिड

  • बीन फ्लाई: डाइमेथोएट

  • माइट्स (लाल मकड़ी): एबामेक्टिन, इमिडाक्लोप्रिड

  • थ्रिप्स: इमिडाक्लोप्रिड, एसिटामिप्रिड, फिप्रोनिल

  • फली छेदक (पॉड बोरर): क्लोरेंट्रानिलिप्रोल, इमामेक्टिन बेंजोएट, इंडोक्साकार्ब

  • सफेद मक्खी: एसिटामिप्रिड, फ्लोनिकामिड, इमिडाक्लोप्रिड

प्रमुख रोग एवं रोकथाम:

  • एंथ्रेक्नोज: एज़ोक्सीस्ट्रोबिन, डाइफेनोकोनाज़ोल, कॉपर ऑक्सीक्लोराइड

  • झुलसा (ब्लाइट): मैंकोज़ेब, कॉपर ऑक्सीक्लोराइड, साइमोक्सानिल

  • मोज़ेक वायरस: स्पाइरोमेसिफेन, इमिडाक्लोप्रिड, एसिटामिप्रिड (वाहक कीट नियंत्रण के लिए)

  • रस्ट (गेरुआ/रतुआ): एज़ोक्सीस्ट्रोबिन + डाइफेनोकोनाज़ोल

तुड़ाई:

  • बीजों के पूरी तरह विकसित होने से पहले ही छोटी, मुलायम और रसीली फलियों की तुड़ाई करें।

  • फलियों की गुणवत्ता बनाए रखने और लगातार नई पैदावार को बढ़ावा देने के लिए हर 2–3 दिन में नियमित तुड़ाई करें।

  • फलियों को अधिक पकने न दें, क्योंकि वे रेशेदार (कड़ी) हो जाती हैं।

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