1. जलवायु और मिट्टी
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तापमान: 18°C से 25°C के बीच का तापमान सर्वोत्तम विकास के लिए अनुकूल है। अधिक तापमान (35°C से ऊपर) के कारण फूल और फलियां झड़ने लगती हैं।
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मिट्टी: अच्छी जल निकासी वाली हल्की बलुई दोमट या चिकनी दोमट मिट्टी, जिसमें कार्बनिक पदार्थ अधिक हों, आदर्श मानी जाती है।
2. खेत की तैयारी और बुवाई
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तैयारी: खेत को 2 से 3 बार जोतकर भुरभुरा (fine tilth) बना लें। उर्वरता बढ़ाने के लिए अंतिम जुताई के समय प्रति हेक्टेयर 20-25 टन गोबर की खाद (FYM) मिलाएं।
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बीज दर: बुश किस्मों के लिए लगभग 15-20 किलो बीज प्रति एकड़ पर्याप्त हैं।
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दूरी: बीजों को मेड़ों या समतल क्यारियों में बोएं। कतार से कतार की दूरी 45 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 10-15 सेमी रखें। गहराई 3-4 सेमी होनी चाहिए।
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मौसम: मैदानी इलाकों में बुवाई का सबसे अच्छा समय जुलाई-अगस्त (खरीफ) और जनवरी-फरवरी (वसंत/ग्रीष्म) है।
3. खाद और उर्वरक
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बुनियादी खुराक (Basal Dose): प्रति हेक्टेयर 25 किलो नाइट्रोजन, 60 किलो फास्फोरस (P₂O₅) और 50 किलो पोटाश (K₂O) का प्रयोग करें।
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टॉप ड्रेसिंग: बुवाई के लगभग 25-30 दिन बाद शेष नाइट्रोजन (25 किलो/हेक्टेयर) को टॉप ड्रेसिंग के रूप में डालें।
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नोट: चूंकि बीन्स लेग्यूम (दलहनी) फसलें हैं, इसलिए ये अपनी नाइट्रोजन खुद बनाती हैं; नाइट्रोजन का अत्यधिक प्रयोग न करें, अन्यथा फलियों की जगह केवल पत्तियां ही अधिक बढ़ेंगी।
4. सिंचाई
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बुवाई के तुरंत बाद पहली सिंचाई करें।
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मौसम और मिट्टी के प्रकार के आधार पर 7-10 दिनों के अंतराल पर मिट्टी में नमी बनाए रखें।
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फूल आने और फलियां बनने का चरण बहुत महत्वपूर्ण है; यह सुनिश्चित करें कि मिट्टी सूखने न पाए, ताकि फूल झड़ने से रोके जा सकें।
5. पादप संरक्षण
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बीज उपचार: फफूंदजनित रोगों को रोकने के लिए बुवाई से पहले बीजों को कॉपर-आधारित फफूंदनाशक या बाविस्टिन (2 ग्राम/किग्रा) से उपचारित करें।
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कीट: एफिड्स (aphids) या भृंगों (beetles) पर नज़र रखें; इनके प्रबंधन के लिए 0.1% मैलाथियान या जैविक नीम के तेल का छिड़काव करें।
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रोग: एंगुलर लीफ स्पॉट या ब्लाइट (झुलसा रोग) के प्रबंधन के लिए हर 2 साल में फसल चक्र अपनाएं और इंडोफिल एम-45 का उपयोग करें।
6. कटाई
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बुश बीन्स जल्दी पकती हैं। बुवाई के 50-60 दिनों बाद जब फलियां हल्की हरी, कुरकुरी और कोमल हों तथा अंदर के बीज छोटे हों, तब उनकी तुड़ाई कर लें।
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हर 2 से 3 दिनों में फलियां तोड़ते रहें; कटाई में देरी करने से फलियां सख्त हो जाती हैं और आगे फूल आने की प्रक्रिया कम हो जाती है।